Story 6 दोस्ती Friendship Part 3 : लता - Lata
कहानी 3 — लता
एक हफ़्ते बाद, मीना और फ़रज़ाना किराने की दुकान पहुँचीं, लेकिन लता आज भी नहीं दिखीं।
दुकानदार ने कहा, “लता दीदी तो सुबह से बाहर नहीं निकलीं। शायद मन नहीं है उनका।”
मीना ने फ़रज़ाना की तरफ़ देखा, “चलो, उनके घर चलते हैं। कुछ ठीक नहीं लग रहा।”
फ़रज़ाना ने सिर हिलाया, “हाँ, आज हम वहीं मिल लेते हैं।”
दोनों ब्लॉक‑B की तरफ़ चल पड़ीं।
लता का शांत घर
लता ने दरवाज़ा खोला तो चेहरे पर हल्की‑सी थकान थी। लेकिन दोनों को देखकर मुस्कुरा दीं।
“अरे, तुम लोग?”
मीना बोली, “आप नहीं आईं, तो हम आ गए।”
फ़रज़ाना ने पूछा, “सब ठीक है न, दीदी?”
लता ने बस इतना कहा, “हाँ… बस आज बाहर जाने का मन नहीं हुआ।”
तीनों अंदर आ गईं। कमरा साफ़ था, लेकिन हवा में एक हल्की‑सी उदासी थी।
चाय और एक पुरानी कहानी
मीना ने रसोई में जाकर पूछा, “दीदी, चाय बनाऊँ?”
लता ने कहा, “नहीं, मैं बना लेती हूँ।”
लेकिन फ़रज़ाना ने मुस्कुराकर कहा, “आज हम बनाएँगे। आप बस बैठिए।”
लता खिड़की के पास अपनी झूला‑कुर्सी पर बैठ गईं। कुछ देर चुप्पी रही।
चाय लेकर तीनों खिड़की के पास बैठीं। मीना ने धीरे से पूछा, “दीदी… आज आप बहुत चुप हैं। अगर बताना चाहें तो… क्या हुआ?”
लता ने बाहर देखते हुए कहा, “कुछ नहीं… बस पुरानी बातें याद आ गईं।”
फ़रज़ाना ने धीरे से कहा, “कौन‑सी बातें?”
लता ने गहरी साँस ली।
लता की कहानी
“जब मैं जवान थी, मेरी शादी बहुत अच्छे आदमी से हुई थी। हम दोनों एक‑दूसरे को बहुत चाहते थे। लेकिन… हम बच्चे नहीं कर पाए।”
मीना और फ़रज़ाना चुपचाप सुनती रहीं।
“उसके घरवालों ने मान लिया कि गलती मेरी है। बहुत दबाव डाला। और एक दिन… उन्होंने उसे मजबूर कर दिया कि वह मुझे छोड़ दे।”
लता की आवाज़ धीमी थी।
“वह मुझे प्यार करता था… पर परिवार के सामने टिक नहीं पाया। तलाक हो गया। और उसने दूसरी शादी कर ली।”
कुछ पल की चुप्पी।
फिर लता ने हल्की‑सी कड़वी मुस्कान के साथ कहा—
“और विडंबना देखो… दूसरी शादी में भी बच्चे नहीं हुए। तब समझ आया कि गलती मेरी नहीं थी। पर अब क्या फ़ायदा? ज़िंदगी तो बदल चुकी थी।”
फ़रज़ाना ने धीरे से पूछा, “आपको उनसे गुस्सा आता है?”
लता ने सिर हिलाया, “नहीं… वह बुरा आदमी नहीं था। बस… कमज़ोर था। काश उसने थोड़ा लड़ लिया होता… काश उसने कहा होता कि हम साथ रहेंगे। पर उसने परिवार की बात मान ली।”
मीना ने पूछा, “अब उनसे बात होती है?”
लता ने सिर झुका लिया, “नहीं। उनके घरवालों से भी नहीं। सब रिश्ते धीरे‑धीरे टूट गए।”
“एक बात और थी,” लता ने कहा।
“मेरे ससुर… वह मेरे साथ थे।
वह तलाक के ख़िलाफ़ थे और कहते थे कि मैं इस घर की इज़्ज़त हूँ।
पर वह भी अपनी पत्नी के सामने कुछ नहीं कर पाए।
सासू माँ का दबाव इतना ज़्यादा था कि
आख़िर में ससुर जी भी चुप हो गए।
लता कुछ देर चुप रहीं। मीना और फ़रज़ाना एक‑दूसरे को देख रही थीं। दोनों के मन में एक ही सवाल था— लता के अपने मायके वाले कहाँ थे? उनके माता‑पिता? उनका परिवार? पर दोनों ने सोचा कि आज यह सवाल पूछने का सही समय नहीं है। लता पहले ही बहुत कुछ बाँट चुकी थीं। शायद किसी और दिन… जब उनका मन हल्का हो, तब वे यह बात पूछेंगी।
मीना ने धीरे से पूछा,
“दीदी… आज बाहर क्यों नहीं आईं?”
लता ने कहा, “कभी‑कभी… ये सब याद आ जाता है। फिर मन बिल्कुल उदास हो जाता है। किसी से बात करने का मन नहीं करता। आज वही दिन था।”
फ़रज़ाना ने लता का हाथ पकड़ लिया, “दीदी… ऐसे दिनों में अकेली मत रहा कीजिए।”
मीना बोली, “हम हैं न। “आप अकेली नहीं हैं। आप भले ही अपने घर में अकेली हों, पर अब हम आपके अपने हैं… परिवार जैसे।”
लता की आँखें भर आईं, लेकिन चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान थी।
“अच्छा हुआ तुम दोनों आ गईं। मन थोड़ा हल्का हो गया।”
तीनों खिड़की के पास बैठीं, मीना ने चाय बहुत मीठी बना दी थी।
“अरे, ये चाय तो बहुत मीठी है… मेरे लिए तो बिल्कुल ठीक नहीं,” लता ने शिकायत की।
मीना हँस पड़ी, “जानबूझकर ही मीठी बनाई है, दीदी… ताकि आपका मुश्किल दिन थोड़ा मीठा हो जाए।”
फ़रज़ाना ने भी मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, आज की कड़वाहट को मिठास से धोना ज़रूरी था।”
लता हँस पड़ीं।
उनकी मुस्कान देखकर दोनों औरतें भी हँसने लगीं।
और धीरे‑धीरे लता का दिल फिर से खुलने लगा।
उस शाम, लता के शांत घर में पहली बार हफ़्तों बाद हँसी गूँजी।
👈 PREVIOUS STORY 🙏 NEXT STORY 👉
Comments
Post a Comment