Story 5 - टिफ़िन बॉक्स - Tiffin box - Short Hindi Story
टिफ़िन बॉक्स
कक्षा 7 के आठ–दस लड़कों का एक छोटा‑सा रिवाज़ था। हर दिन लंच ब्रेक में वे अपने क्लासरूम के बाहर ठंडी फर्श पर गोल बनाकर बैठते थे और साथ‑साथ खाना खाते थे।
वे अलग‑अलग राज्यों से आए थे, और उनके टिफ़िन में उनके घरों का स्वाद भरा होता था।
रोहन के टिफ़िन में नरम सफ़ेद इडली और थोड़ा‑सा पोड़ी मसाला होता। कबीर मोटे पंजाबी परांठे लाता, जिनके साथ मक्खन की छोटी डली फॉइल में लिपटी रहती। अर्जुन के पोहे में मूंगफली, करी पत्ता और हल्की‑सी नींबू की खुशबू होती। रोनो का लेमन राइस इतना ताज़ा महकता कि पास से गुज़रने वाले का दिल ख़ुश हो जाए । देव के थेपले कागज़ में साफ़‑सुथरे लिपटे होते। हर्ष छोटी‑छोटी बाटियाँ और साथ में दाल का छोटा डिब्बा लाता। कभी‑कभी कोई बंगाली मिठाई, कर्नाटक का दही‑चावल या दादी के हाथ का अचार भी लाता ।
वे गोल बनाकर बैठते, टिफ़िन खोलते और रोज़ एक ही बात कहते:
“चलो, आज सबसे पहले किसका खाना चखा जाए ?”
वे हँसते, बातें करते, और अपने घरों की कहानियाँ साझा करते। उनके बीच कोई भेद नहीं था—सिर्फ़ अपनापन।
एक दोपहर प्रिंसिपल रोज़ की तरह गलियारे में घूम रहे थे। जब वे कक्षा 7 के पास पहुँचे, तो उन्होंने वही परिचित दृश्य देखा—
फर्श पर बैठे टिफ़िन वाले बच्चे, खाना बाँटते हुए, एक‑दूसरे को सुनते हुए, और बिना किसी झगड़े या शोर के, एक परिवार की तरह खाते हुए ।
प्रिंसिपल कुछ क्षण वहीं रुक गए।
उन्होंने देखा कि कैसे ये बच्चे अपने टिफ़िन आगे बढ़ाते हैं, कैसे सबके लिए जगह बनाते हैं, कैसे कोई भी अकेला नहीं रहता, कैसे हर आवाज़ सुनी जाती है।
और उनके मन में एक विचार आया—
“काश मेरे शिक्षक भी एक‑दूसरे के साथ ऐसे ही व्यवहार कर पाते… काश स्टाफ मीटिंग्स में भी इतनी ही शांति, सम्मान और सहयोग होता… तो यह स्कूल कितना सुंदर हो जाता।”
उन्हें पता था कि स्टाफ रूम में अक्सर छोटी‑छोटी बातों पर बहस हो जाती है। कभी आवाज़ें ऊँची हो जाती हैं, कभी धैर्य कम पड़ जाता है, और कभी‑कभी सहयोग की जगह दूरी आ जाती है।
लेकिन यहाँ, इन बच्चों के बीच, सब कुछ सहज था— जैसे यह स्वाभाविक हो।
उस दिन के बाद, जब भी प्रिंसिपल इस टिफ़िन वाले गोल के पास से गुज़रते , उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती।
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