Story 3: मुंबई लोकल (Commuter) ट्रेन की कहानी -- Mumbai Local (Commuter) Train Story
मुंबई लोकल (Commuter train) की एक कहानी
मुंबई लोकल हमेशा की तरह भरी हुई थी। लोग ऑफिस जा रहे थे, कोई मोबाइल पर बात कर रहा था, कोई नींद पूरी कर रहा था, और कोई बस भीड़ से लड़ रहा था।
अगले स्टेशन पर दो दुबले‑पतले बच्चे चढ़े। फटे कपड़े, भूखे चेहरे, और आँखों में वही पुरानी उम्मीद — “शायद आज कोई मदद कर दे।”
वे धीरे‑धीरे कम्पार्टमेंट में आगे बढ़ने लगे,
“भैया, कुछ पैसे दे दो… दो दिन से खाना नहीं खाया…”
लेकिन कोई ध्यान नहीं दे रहा था। लोग मोबाइल में, अख़बार में, या बस अपनी थकान में खोए हुए थे।
राकेश, जो रोज़ इसी ट्रेन से ऑफिस जाता था, बच्चों को देखता रहा। उसे लगा कि उसे बच्चों की मदद करनी चाहिए।।
उसने अपना लंचबॉक्स खोला। अंदर दो गरम‑गरम पराठे थे, जो उसकी पत्नी ने सुबह जल्दी उठकर बनाए थे।
वह बोला, “आओ बेटा, पैसे नहीं हैं, पर खाना है। ले लो।”
दोनों बच्चे खुश हो गए। लेकिन पराठा लेने से पहले एक बच्चा बोला,
“भैया… ये पराठा वेज है न? हम मांस नहीं खाते।”
पूरी बोगी में एक पल की चुप्पी छा गई — फिर अचानक हँसी फूट पड़ी।
राकेश हँसते हुए बोला, “हाँ भाई, बिल्कुल वेज है! घर का बना हुआ।”
इतने में एक और यात्री बोला, “ये लो मेरे पास भी वेज बिस्किट हैं!”
दूसरा बोला, “मेरे पास वेज समोसा है, ले लो!”
तीसरा बोला, “और ये वेज केला भी है!”
बच्चे हँसते‑हँसते बोले, “अरे हम समझ गए! सब वेज है!”
बोगी में माहौल हल्का हो गया। दोनों बच्चे खुशी‑खुशी खाना खाने लगे, और ट्रेन आगे बढ़ती रही — सबको यह देखकर खुशी हुई कि बच्चे खाना खा रहे थे और सब कुछ वेज ही था।
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